Developed an LLM from Scratch, trained to generate "Kabir ke Dohe" (Indian Hindi Poetry by Saint Kabir)
आय ित ह, का न भराय।
जो ह का काम तहा नाम नह, जौ उतारे पार॥
म अपराधी ज म का, नख-िसख भरा िवकार।
तुम दाता दु:ख भजंना, मेरी करो स हार॥
ेम न बड़ी ऊपजै, ेम न हाट िबकाय।
राजा- जा जोिह च, शीश देई ले जाय॥
ेम याला जो िपये, शीश दि णा देय।
लोभी शीश न दे सके, नाम ेम का लेय॥
सुिमरन म मन लाइए, जैसे नाद कुरंग।
कह कबीर िबसरे नह , ान तजे तेिह सगं॥
सुमिरत सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल।
बाहर का पट ब द कर, अ दर का पट खोल॥
(Doesn't make much sense, but we can see the gpt has generalized well to the format!)